Get Well Soon Sonam -- Pustak Samiksha : Atulya Khare
Pustak Samiksha : Atulya Khare
समीक्षित पुस्तक : गेट वेल सून सोनम
विधा: उपन्यास
द्वारा: विपिन धनकड़
वेरा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
प्रथम संस्करण वर्ष : 2025
मूल्य : 200
समीक्षा क्रमांक : 243
सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा के तो सैकड़ों किस्से हम सभी ने सुन व देख रखे हैं किन्तु “गेट वेल सून सोनम” के द्वारा लेखक विपिन धनकड़ जिनका यह दूसरा उपन्यास है, ने बड़े अस्पताल के अंदरूनी हालातों से परिचित करवाया है, एव उनके द्वारा अस्पताल की चकाचौंध के संग वहाँ व्याप्त व्यावसायिकता का जो कड़वा सच सामने रखा गया है वह चौंकाता है ।
कथानक एक महिला को पेट दर्द की तकलीफ के कारण भर्ती करने से प्रारंभ होकर उसके डिस्चार्ज होने तक का दृश्य प्रस्तुत करता है, जहां अस्पताल की कमोबेश हर बड़ी छोटी प्रक्रिया, इलाज, फीस, ऑपरेशन एवं अन्य तकलीफ तथा सुविधाओं के विषय में उस महिला के पति की नज़रों से वहाँ का माहौल दिखलाने का सफल प्रयास किया गया है।
लेखक ने अस्पताल की तुलना एक आलीशान मॉल से की है। इन मॉल रूपी चमचमाते बहुमंजली अस्पतालों में अंदर घुसते ही चमचमाते फर्श, सेंट्रलाइज्ड AC, रिसेप्शन पर सुसज्जित वेशभूषा में स्वागत करने हेतु तत्पर कर्मचारी यह सब देखकर एक पल के लिए आप भ्रमित हो उठते हैं कि आप वाकई इलाज कराने ही आए हैं न। किन्तु, यह चमक-दमक मरीज की राहत के लिए कम और बिल की राशि को वाजिब ठहराने के लिए ज्यादा प्रतीत होती है। जिस प्रकार मॉल में प्रवेश द्वार पर लंबी कतार होती है, वैसे ही यहाँ भी मरीज़ की भर्ती की प्रक्रिया में घंटों फाइलें लेकर एक काउंटर से दूसरे काउंटर भागना और फिर बगैर सिफारिश के भर्ती न होने का खेल दिखलाया गया है।
कुछ स्थानों पर पति के नजरिए से यह कड़वी सच्चाई भी सामने रखी गई है कि नामी अस्पतालों के लिए मरीज की बीमारी एक 'प्रोजेक्ट' है जहां इस पर उसी प्रकार से कार्य होता है जैसे की किसी प्रोजेक्ट पर चरण बद्द तरीके से किया जाता है। साथ ही अस्पताल की कैंटीन में एक कप चाय या खाने की थाली अथवा बार-बार होती सफाई और वर्दीधारी कर्मचारियों का अनुशासन, सभी मुद्दों पर लेखक की गहन दृष्टि रहीं है।
पुस्तक आधुनिक और नामी अस्पताल के भीतर की वह दुनिया दिखाती है, जिसे हम अक्सर केवल डर या बीमारी के नजरिए से देखते हैं। लेखक ने, एक मरीज के तीमारदार की नजर से, बहुत कुछ महसूस किया, फिर चाहे वह ड्रिप की बूंदें हों या नर्सों की भागदौड़, और इन सभी पलों को शब्दों में अत्यंत खूबसूरती से पिरोया है।
अस्पताल में इलाज की विभिन्न प्रक्रियाएं, परीक्षण, बड़ी मशीनों और ऑपरेशन का डर, इस सबके साथ डॉक्टर तथा नर्सों का भरोसा व उनके उस पेशेवर व्यवहार की भी बात होती है, जो मरीज को यह यकीन दिलाता है कि वह सुरक्षित हाथों में है। साथ ही उन नर्सों के बारे में भी लिखा गया है जो मरीजों का सर्वाधिक ख्याल रखती हैं। उनके साथ होने वाली छोटी-छोटी बातें और उनकी मुस्कुराहट कैसे दर्द को कम कर देती है।
वार्ड में भर्ती दूसरे मरीजों के साथ साझा किए गए दुख-सुख, किताब को एक नया आयाम देते हैं। कैसे अजनबी लोग एक-दूसरे की बीमारी में सगे बन जाते हैं, अपनी मुश्किलें और परेशानियाँ साझा करने लगते हैं यह मानवीय संवेदनाओं का बेहतरीन उदाहरण है।
पुस्तक, मरीज के संग देखभाल करने वाले परिवार के सदस्य के संघर्ष, धैर्य और उसके प्रेम की भी कहानी है। अक्सर अस्पताल की कहानियाँ मरीज के इर्द-गिर्द घूमती हैं, लेकिन यह पुस्तक उस व्यक्ति की मानसिक स्थिति को दर्शाती है जो वार्ड में या मरीज के संग प्रायवेट रूम में बैठा अपनी पत्नी के ठीक होने का इंतज़ार कर रहा है। वह यहाँ मात्र एक सहायक नहीं, अपितु एक सूत्र है जो डॉक्टर, अस्पताल प्रशासन नर्स मरीज़ और परिवार के बीच एक पुल का काम करते हुए उनमें सामंजस्य बैठा रहा है। अक्सर वह नर्सों से डॉक्टर से छोटी-छोटी जानकारियां जुटाने की कोशिश करता है। कभी निवेदन, कभी चापलूसी और कभी थोड़ा गुस्सा, स्टाफ के साथ उसके ये उतार-चढ़ाव भरे रिश्ते उसकी पत्नी की बेहतर चिकित्सा व्यवस्था हेतु किये जा रहे प्रयासों की ही एक कड़ी हैं। एवं उसके यह अनथक प्रयास अत्यंत भावुक करने वाले हैं। वहीं चंद भाव ऐसे भी हैं जो अत्यंत स्वाभाविक हैं एवं व्यवहार में लक्षित होते हैं यद्यपि शब्दा ङ्कन नहीं हैं तथापि कैंटीन की चाय और अकेले बैठकर खाना खाते हुए अपनी पत्नी की कमी को महसूस करना जैसे भाव सहज दृष्टव्य हैं।
पति की नज़र से अस्पताल की सफाई व्यवस्था का वर्णन एक अलग नजरिया देता है। उसे सफाई कर्मचारी भी एक उम्मीद की तरह लगते हैं जो व्यवस्था को बनाए रखते हैं। वह अस्पताल की चकाचौंध को एक ग्राहक और एक लाचार तीमारदार दोनों की ही तरह देखता है।
वहीं मरीज की चिंता केवल अपनी बीमारी तक सीमित नहीं है। बिस्तर पर लेटे हुए उसे अस्पताल में अपने बच्चे याद आते हैं उनकी दिनचर्या उसे भुलाये नहीं भूलती। यूं तो वह खुद दर्द में है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि उसकी वजह से उसका पति परेशान हो रहा है और बच्चे घर पर अकेले हैं। कहीं न कहीं वह खुद को एक 'बोझ' के रूप में देखने लगती है। जबकि पति जिसकी स्थिति एक पुल के समान है। उसे अस्पताल की प्रक्रियाओं से भी जूझना है घर पर बच्चों को यह दिलासा भी देना है कि "मम्मी जल्दी आ जाएगी।" पत्नी की बीमारी को गंभीर जानते हुए भी वह अपनी थकान और डर को मुस्कुराते हुए चेहरे के पीछे छिपाने की कला सीख जाता है। जबकि घर पर छूटे बच्चे की मानसिकता अक्सर नहीं पढ़ी व समझी जाती जो की इस तरह के कथानक का सबसे शांत लेकिन मार्मिक हिस्सा होती है। माँ के बिना घर का सूनापन, पिता का फोन पर छोटे जवाब देना उन्हें समय से पहले बड़ा बना देती है। उस बच्चे की दुनिया 'मम्मी के लौटने' की तारीख पर टिक जाती है।
वहीं किसी अस्पताल के विषय में बात करते हुए महत्वपूर्ण हो जाता है वहाँ के स्टाफ का व्यवहार । इस पुस्तक में उस भावनात्मक पहलू को भी प्रमुखता से देखा गया है और यह भ्रांति तोड़ने की एक सफल कोशिश भी है की अस्पताल का स्टाफ मशीनी होता है,जबकि डॉक्टर जो खडूस संबोधित किये जाते हैं अक्सर ऊपर से सख्त किन्तु कोमल हृदय होते हैं। पेशेवर दिखने वाले डॉक्टर के मन में भी हार का डर होता है। जब वह किसी जटिल ऑपरेशन के बाद मुस्कुराता है, तो वह केवल एक डॉक्टर नहीं, बल्कि एक राहत महसूस करने वाला इंसान होता है। तो नर्सिंग स्टाफ जोकि इस कहानी के, किसी भी अस्पताल रीढ़ हैं वे दूसरों की पत्नियों, माताओं और बच्चों बुजुर्गों की सेवा करते हुए, अक्सर अपने घरों को भूल जाती हैं। रात की शिफ्ट में जब वे किसी मरीज का हाथ थामती हैं, तो वह केवल 'ड्यूटी' नहीं, बल्कि इंसानियत होती है, मानवता का भाव होता है। पैशन्ट के घर ठीक होकर जाते देख कर उन्हें भी खुशी होती है।
और वह सफाई कर्मी जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं, वह साफ सफाई करते हुए भी जीवन की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाइयों (बीमारी और मृत्यु) को रोज करीब से देखता है। वह भी एक इंसान है जो चाहता है कि लोग उसे एक मशीन के बजाय एक सहायक के रूप में देखें। उनमें भी भवनायेँ होती हैं अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच केवल दवाइयाँ एवं इलाज ही नहीं चलते, बल्कि भावनाओं का एक ऐसा अदृश्य अध्याय भी होता है जिसे केवल वही समझ सकता है जो उस दौर से गुजरा हो।
यह पुस्तक हमें यह अहसास करा देती है कि अस्पताल केवल ईंट-पत्थरों या महँगी मशीनों का ढांचा नहीं है। यह एक ऐसी जगह है जहाँ इंसानियत, मानवता और प्रेम का सतत इम्तिहान होता है। क्यूंकि वह हाई-फाई बिल हो या कैंटीन की बेस्वाद चाय, इन सबके बीच एक धागा जो सबको जोड़े रखता है, वह है उम्मीद।
लेखक ने बहुत खूबसूरती से दिखाया है कि वर्दी के पीछे डॉक्टर और नर्स भी थकते हैं, उन्हें भी बुरा लगता है और वे भी भावनाएं व्यक्त करना चाहते हैं। यह किताब हमें एक-दूसरे के प्रति अधिक संवेदनशील होने की प्रेरणा देती है।
अतुल्य खरे




.png)
.png)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें